Wednesday 21st April 2021

त्रिसंध्यकाल में पूजित,पौराणिक नदी- वैनगंगा

त्रिसंध्यकाल में पूजित,पौराणिक नदी- वैनगंगा

लेख*अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

मानव सभ्यता के सतत विकास की आधार शिला, नदियाँ ; और उनके तट हैं। आदरणीय जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज ने श्री राजेन्द्र नेमा ‘क्षितिज‘ जी द्वारा संपादित पुस्तक ‘बैनगंगा दर्पण (उद्गम से संगम)‘ में नदियों के पौराणिक महत्व के विषय में प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया कि ‘पुराणोल्लेखित ‘वेण्या‘ अथवा ‘वेणी‘ ही आज की बैनगंगा अर्थात ‘वैनगंगा‘ नदी है’। अन्य स्रोत के साथ, यह संग्रहणीय पुस्तक भी आलेख की प्रेरणा स्त्रोत है। मध्य-भारत की यह पौराणिक नदी; वैनगंगा वर्तमान मध्यप्रदेश के मध्य प्रायः भाग में वनाच्छदित सिवनी जिले के राष्ट्रीय राजमार्ग -7 पर, नागपुर गमन दिशा तरफ़, लगभग 12 किलोमीटर दूर, गोपालगंज कस्बे की प्राची दिशा के, परतापुर ग्राम में, सतपुड़ा ढलान में स्थित ‘मुंडारा‘ में एक छोटी सी जलधारा के रूप में पृथ्वी पर अवतारित हो रही हैं। यह स्थान चहुओर से घिरे एक कुण्ड के रूप में प्रमुख ग्रामीण-मार्ग पर स्थित है, जिसके आस-पास प्राचीन शिव मंदिर, वृक्ष समूह ; एवं कृषि भूमि, मनोरम दृष्य का सृजन करते हैं। इस नयनाभिराम स्थली से निकलने वाली लघु जलधारा अपने प्रयाण मार्ग में शैन-शैने विराट होती गई हैं। मानव समाज को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक विकास का आर्शीवाद देने वाली यह जल-धारा, पौराणिक महत्व की होने के बाद भी, भारत के इतिहास पृष्ठों में अदृष्य सी रही; इसका मूल कारण, तत्कालीन पाश्चात्य इतिहास लेखकों का अन्यायिक, अल्पदूरदर्शी तथा संकुचित-वृहद दृष्टिकोण है, ऐसा मेरा मत है।



पूर्व शताब्दियों में हुए सतत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि, वैनगंगा के तटों जैसे बंडोल, दिघौरी, अलोनी, सरेखा, गंगेरूआ, भंडारा आदि स्थानों में आदिम युगीन मानव सभ्यता के अवषेश मिले हैं। भित्ती चित्र, ताम्रयुगीन शस्त्र, मिट्टी के पात्र, मूर्तियां इत्यादि अति महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुईं हैं। इससे पता चलता है कि, यह पवित्र सलिला कितनी प्राचीन है। अज्ञ लेखकों के अकर्मण्य लेखन से जहाँ मध्य भारत की इस नदी को जगसम्मुख आने का अवसर नहीं मिला ; कर्मण्य लोगों के प्रयासों ने इसके आलौकिक दर्शन को अमूल्य योगदान दिया।
वैनगंगा के उद्गम एवं उत्पत्ति के विशय में अनेक जन प्रवाद समाज में प्रवाहित हैं; जैसे आदिकाल में भण्डकदेश (वर्तमान महाराष्ट्र में स्थित भंडारा) में वेन नामक धर्मात्मा राजा था, जो प्रतिदिवस योगसाधना के बल से माँ गंगा जी का स्नान करने प्रयाग राज जाता था। वृद्ध राजा जब गंगा जल कम्ण्डल में लेकर लौट रहा था तब थकान वश मुंडारा में रूका ; और यहीं उससे गंगा जल पात्र उलट गया। वचनानुसार गंगा जी ने यहीं अवतरण किया। इसी प्रकार गौंड आदिवासियों में बैनगंगा की उद्गम किवदंती प्रचलित है कि, प्राचीन समय में एक गौंड पटैल (प्रमुख) नें अपनी इकलौती बेटी ‘गंगा‘ के विवाह के लिए सुयोग्य वर चयन हेतु, एक गौंड नवयुवक ‘बेनी‘ को ‘लमसेना‘ बनाया था। इसका तात्पर्य, विवाह के पूर्व चयनित लड़के का वधु पक्ष के घर में कुछ समय रहना था। पटैल के कहने पर बेनी ने कुंआ खोदा और उसी के जल में समाधिस्थ हो गया; जब गंगा ने पुकार लगाई तो पानी से उसके दो हाथ बाहर आए, यह देख गंगा भी उसमें कूद गई। इसी अमर प्रेम कहानी के मिलन से निकली इस नदी का नाम बैनगंगा/वैनगंगा पड़ा।



इन सभी लोक कथाओं के परे यदि हम दार्षनिक विचार करें तो संभवतः लोगों ने इसे गंगाजी के समतुल्य मान कर उनकी बहन का दर्जा दिया हो और ‘बहनगंगा अर्थात बैनगंगा नाम पड़ा हो। बेन का शब्दिक अर्थ ‘बहन‘ ही होता है। इसी प्रकार शिव की जटाओं या वेंणियों में स्थान पाने वाली गंगा की बहन ‘वेणुगंगा, या बैनगंगा कहलाई हो ! इसकी प्राचीनता के विषय में एक और सुसंगत तथ्य है कि, सतपुड़ा श्रंग-श्रेणियों से यह नदी प्रवाहित होती है ; और स्वयं सतपुड़ा पर्वत की प्राचीनता के लिए बैनगंगा दर्शन पुस्तक से पता चलता है कि, महान इतिहास वेत्ता डॉ. वासुदेव शरण उपाध्याय जी ने अपने शोधग्रंथ ‘कालिदास का भारत‘ में पुराणों में वर्णित ‘ऋक्षवान‘ पर्वत को वर्तमान सतपुड़ा मानने पर बल दियां । महाराष्ट्र के चाँदा, वर्धा के पास प्राचीन विकसित नगरों के अवशेष मिले है; जबकि सिवनी में प्राचीन लोगों की जीवन की चित्र-चर्या के भित्ती चित्र भी मिले हैं। बैनगंगा का प्रवाह पथ चहों दिशाओं में झूलता-धूमता गतिमान होता है। अनगिनत लोगों की प्यास, आस ; और प्रत्याषा को पूर्ण करने वाली, बसंती सुषमा फैलाने वाली नदी जिसकी लहरों के कर्ण अहलादन, तुमुल नाद से निशी-वासर में आनंद छा जाता है, ऐसी अनुताप हारिणी माँ वैनगंगा, मुंडारा मप्र से कालेश्वर (कालेष्वरम्) (पुराना आंध्रप्रदेश, वर्तमान तेलंगाना) में दक्षिण की गंगा नाम से पूजित, गोदावरी नदी में विलय तक लगभग 650 किमी की यात्रा करती है। कुछ जगह 579 किमी भी उल्लेखित है। इसी यात्रा-पथ में यह हीरत-धारा, अजस्त्र धरती पर, परत्र जैसा वातावरण सर्मरित करती है। इस मार्ग में अनेक स्थलों में प्राकृतिक वैशिष्ट के दर्शन होते है ; जैसे- कोठीघाट में श्याम-शैलों की जलधारा के काट से कोठियाँ बनी हैं। पावनी के नीलकण्ठ घाट में 4 से 5 फुट का परिक्षेत्र ऐसा है, जिसमें बिल्वपत्र और जूही के फूल चढ़ाने पर डूब जाते है; एवं बाकी सामग्री तैरती रहती है। वाकी शरीफ़ में जिस नीम के पेड़ के नीचे ताजुदीन बाबा ने साधना की थी, एक तरफ़ की पत्ती मीठी, तो दूसरी ओर की खट्टी हैं। शंकरघाट में स्वर्ण चम्पा, अर्धनारेश्वर का दुर्लभ वृक्ष लगा है। इसी प्रकार केवलारी के पास खरपड़िया में एक स्थान पर बैनगंगा सात धाराओं में विभक्त हो जाती हैं। यह पवित्र नदी प्राकृतिक आश्चर्यों का संगम है। दिघौरी में विश्व का सबसे बड़ा स्फाटिक शिवलिंग स्थापित है।



गंगा जी, नर्मदा जी की तरह बैनगंगा जी के तटों में भी महाशिवरात्रि, मकर संक्राति, कार्तिक पूर्णिमा, सावन गुरूपूर्णिमा में अनेक बड़े-छोटे मेले तथा मढ़ई भरते हैं। मनका टेकरी में मुर्हरम माह में मनने वाला उर्स, दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। ये सब माँ बैनगंगा के तटीय भू-भाग हैं। इसी क्रम में देवघाट में 9 मई से 11 मई 2008 तक मनाया गया बैनगंगा महोत्सव, आज भी लोगों में उत्साह और रोंमाच भर देता है। छपारा के घाट में दीपदान महोत्सव विराट रूप में होता है, यहां के मूलनिवासी कवि मुकेश मनमौजी एवं कवि सिसोदिया जी (दादी मास्साब) ने बताया कि, यहां विशाल चुनरी बैनगंगा को चढ़ाई जाती है; तथा विभिन्न मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। मुडारा की कांवड़यात्रा करने दूर-दूर से श्रृद्धालु आते हैं। इन सभी कार्यक्रमों में लोगों का शलाध्य योगदान रहता है। बालारूण प्रतिभ से सूर्यास्त तक इन तटों की छटा निराली रहती है। मध्य भारत की इस विशाल नदी की कई सहाइकाएँ है; कथानी हिर्री, चंदन, बावनथली, कन्हान तथा वर्धा जिसके साथ संधि कर यह प्राणहिता के नाम से बहती है।



इसके बाद भी इंसान ने अपने स्वार्थ के कारण इसके जल को दूषित किया है। मूल रूप में प्रदूषण हमारी सोच में पहले होता है, तदोपरांत इसकी मानव जनित व्यवहारिकता से पर्यावरण प्रभावित होता है। यदि हम अपने मन में स्वच्छता का गाँधीवादी प्रण लें तो निश्चित ही हमारी नदियां, जंगल, पहाड़; और नगर प्रकृति विरोधी गतिविधियों से सुरक्षित हो जाएंगे। यहाँ बैनगंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए स्थानीय लोगों, स्वयं सेवी संगठनों के साथ मीडिया का योगदान सराहनीय है। वारासिवनी के साहित्यकार, कवि आचार्य प्रणय श्रीवास्तव ने माँ वैनगंगा पर चालीसा, अष्टक एवं आरती की रचना की है जिसका 2013 से वे बैनगंगा तटों पर निरंतर सामूहिक जाग्रति पाठ करते आ रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही पर स्वच्छता के प्रति सार्वजनिक सोच, सक़ारात्मक रूप ले रही है। प्रारंभिक व्रीड़ाएं तो अवश्य होंगी पर नदियों की स्वच्छता के प्रति मानवीय संकल्प यह बताता है कि, हम अपने उत्तरदायित्वों को जानते-समझते; और मनन करते हैं। ‘‘कोस-कोस पर पानी बदले तीन कोस पर बानी‘‘ के बाद भी न केवल राष्ट्रीय नदियों, अपितु प्रत्येक जल-धारा की पवित्रता के प्रति हम एक जुट होकर संवेदनशील रहेंगे यही हमारा प्रण होना चाहिए।

अखिलेश सिंह श्रीवास्तव (कथेतर लेखक)
दादू मोहल्ला, संजय वार्ड
सिवनी (म.प्र.)



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