Sunday 17th January 2021

तुम देश विरोधी नहीं बनो

कविता*विक्रम कुमार



तुम देश विरोधी नहीं बनो
निकले हैं जो सड़कों पर अपने हथकंडे लेकर
देश जलाने निकले हैं जो नारे और झंडे लेकर
उनसे कह दो भारत में ये दहशतगर्दी ठीक नहीं
राम-कृष्ण की धरती पर ये गुंडागर्दी ठीक नहीं
लोकतंत्र में धरनों का मान सदा ही ऊंचा है
नीतिगत-दलगत विरोध का स्थान सदा ही ऊंचा है
यह शांत-सौम्य-शालीन धरा परिवेश विरोधी नहीं बनो
दल के विरोध के चक्कर में तुम देश विरोधी नहीं बनो

क्या मतलब था कब्र खुदेगी वाले उन ललकारों का
क्या मतलब था अफजल वाले उन बेशरमी नारों का
क्या मतलब है देश विरोधी दरिया में बह जाने का
भारत तेरे टुकडे़ होंगे क्या मतलब है कह जाने का
ऐसी बेशरमी का तुमको पाठ पढा़या मूर्खों ने
भूल गए कि अखंड हिंद का संदेश दिया था पुरखों ने
राजनीति में पुरखों के संदेश विरोधी नहीं बनो
दल के विरोध के चक्कर में तुम देश विरोधी नहीं बनो

देश जलाने की खातिर हथियार लिए क्यों बैठे हो
आगजनी बम बारूदों का बाजार लिए क्यों बैठे
क्यों करते हो पूरे देश में आग लगाने की बातें
बड़े शान से करते हो तुम मार भगाने की बातें
तुम्हें नहीं पता इससे नुकसान देश का होता है
देश विरोधी नारों से अपमान देश का होता है
लाके अपने अंदर ये आवेश विरोधी नहीं बनो
दल के विरोध के चक्कर में तुम देश विरोधी नहीं बनो

देश बेचने वालों के संग धंधे पर हो बैठ गए
क्यों अजमल-अफजल -वानी के कंधे पर हो बैठ गए
नई -नई कारस्तानी से हर रोज गुजरते हो
जिन्ना वाली आजादी की बातें रोज ही करते हो
अपनी चाह तुम्हें है बस नहीं देश की चाह तुम्हें
रोज जलाते देश ये तुम हो नहीं कोई परवाह तुम्हें
लाठी वाले गांधी के उपदेश विरोधी नहीं बनो
दल के विरोध के चक्कर में तुम देश विरोधी नहीं बनो

*विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली


Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
CATEGORIES

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus (0 )